झारखंड : 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर झारखंड का जन्म हुआ,यह अलगाऊ आंदोलन मात्र एक प्रशासनिक विभाजन नहीं था, बल्कि आदिवासी मूलवासी झारखंड समुदाय की सदियों पुरानी लड़ाई का परिणाम था। जल ,जंगल ,जमीन, खनिज संसाधनों पर ऐतिहासिक अधिकार सम्मानजनक जीवन, शिक्षा ,स्वास्थ्य,रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण | यह वह सपने थे जिनके लिए मरंग गमके जयपाल सिंह मुंडा से लेकर विनोद बिहारी महतो तक ने त्याग और बलिदान दिया था लेकिन 25 वर्ष बाद जब राज्य अपनी रजत जयंती मना रहा है सवाल यह उठता है कि क्या हासिल हुआ फिर यह महज ‘हाथी के दांत दिखाने” वाली कहानी बन गई है।
तथ्यों और आंकड़ों के आईने में झांके तो हर उपलब्धि के पीछे एक सवाल छिपा हुआ है वादे जो कागजों पर सिमट गए संविधान की पांचवी अनुसूची के तहत आदिवासी क्षेत्र का संरक्षण छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट का कड़ाई से पालन, स्थानीय नियोजन नीति का क्रियान्वयन यह वह संवैधानिक हक थे जो राज्य गठन के वादे थे| लेकिन 25 वर्षों में इनका क्या हुआ {राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने 2023 के दाता अनुसार }झारखंड में भूमि विवाद से जुड़े अपराधों में 15% की वृद्धि हुई है जिसमें आदिवासी भूमि हड़पने के मामले में सीएनटी एसपीटी एक्ट के उल्लंघन के 70% से अधिक मामले अदालत में लंबित है {झारखंड हाई कोर्ट की 2024 रिपोर्ट} यह सवाल है कि अगर राज्य आदिवासी हितों की रक्षा के लिए बना था तो क्या इन कानून को लागू करने में सरकारी आनाकानी करती रही स्थानीय नीति जो दसवीं अनुसूची के तहत 1932 के निवासियों को प्राथमिकता देती आज भी अधर में लटका है इसका नतीजा हुआ सरकारी नौकरी का 60% हिस्सा बाहरी राज्यों को मिला है[ झारखंड लोक सेवा आयोग की 2024 की डाटा] क्या यह झारखंडी कारण का मजाक नहीं है संसाधनों की लूट खनिज संपदा का शाप|
झारखंड भारत का रूर आफ इंडिया है देश के 40% खनिज संसाधन यहां के हैं कोयला यूरेनियम ,लोह अयस्क, बॉक्साइट यह संपदा राज्य को जीडीपी में 8 से 10% की वार्षिक वृद्धि देने का दम रखती है लेकिन वास्तविकता { 2024 में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडिया इकॉनमी के अनुसार }राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत आय 1.7 लाख से 30% कम 1.2 लाख है |कोयला खनन से सालाना 50000 करोड़ का राजस्व आता है लेकिन आदिवासी जिलों गुमला लोहरदगा में गरीबी की दर 50% से ऊपर है [नीति आयोग 2023 का रिपोर्ट के अनुसार] खनन माफिया और सरकारी तंत्र की साठगाँठ जाहिर है 2022-24 के बीच अवैध कोयला खनन के 1200 से अधिक मामले दर्ज हुए {झारखंड पुलिस रिपोर्ट कहती है} लेकिन सजा के दर केवल 5% है बालू पत्थर चिप्स माफिया ने नदियों को लूट , सवाल है कि अगर राज्य प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है तो आदिवासी समुदाय क्यों भुखमरी की कगार पर है क्या यह लूट विकास का पर्याय बन गया है? विकास के दावे और आंकड़ों का जाल।
सरकारी दावा करते हैं कि 25 वर्षों में बुनियादी सुविधाओं में क्रांति हुई है सड़कों का नेटवर्क 50000 किलोमीटर से लाख बढ़कर एक लाख किलोमीटर हो गया है झारखंड पीडब्ल्यूडी 2024 बिजली पहुंची प्रतिशत से 95% हो गई है [ग्रेड रिपोर्ट 2023] लेकिन यह आंकड़े धोखा देते हैं ग्रामीण क्षेत्रों में 24 घंटे 7 दिन बिजली केवल 30% गांव तक रहती है | आदिवासी भाषा और संथाली मुंदरी के प्राथमिकता शिक्षा नीति 2020 घोषित हुई लेकिन 10% स्कूलों में लागू
योजनाओं पर लूट , में 80% नौकरियां बहरियों को मिला है सवाल है कि अगर विकास हुआ तो नक्सल प्रभावित जिलों पश्चिमी सिंहभूम में ही क्यों 40% साक्षरता दर क्यों आदिवासी युवा पलायन कर दिल्ली मुंबई पहुंच रहे हैं ?आदिवासी झारखंडी हक या हास्य पर है झारखंड की 26% आबादी वाली आदिवासी है लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व क्या है ? आदिवासी समुदाय के आस्था स्थलों पर अतिक्रमण सामुदायिक भूमि सरना स्थल पर अतिक्रमण सवाल ये है कि आदिवासी समाज बढ़ गया या माइनॉरिटी का तमगा क्या PESA का क्रियान्वयन मात्र कागजी तक रह गया?
25 सालों में हमने पाया कि आर्थिक रूप से राज्य जीडीपी 2000 के 30000 करोड़ से बढ़कर 2024 में 4 लाख करोड़ औद्योगिक निवेश दो लाख करोड़ शहरीकरण रांची, धनबाद ,जिससे शहरों में मॉल मेट्रो का विकास हुआ | और हमने खोया सामाजिक उत्तर नक्सलवाद से 5000 मौतें ,पर्यावरण विनाश, संस्कृत क्षरण आदिवासी भाषाएं विलुप्त की कगार पर आदिवासी असमानताएं टॉप 10 प्रतिशत अमीरों के पास 60% संपदा सवाल का अंत में 25 वर्षों में झारखंड में राज्य पाया लेकिन स्वराज को खो दिया आदिवासी समुदाय ने हक मांगे थे लेकिन लूट ,मिली अब समय है आत्म चिंतन का क्या ?नई पीढ़ी आंदोलन के रास्ते चलेगी ?






