झारखंड// भारत के स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासियों के पथ प्रदर्शक जीत राम वेदिया का जयंती आज ,माल्यार्पण और श्रद्धांजलि देकर याद किए गए | केन्द्रीय सरना समिति के महिला मोर्चा अध्ययक्ष निशा भगत और अध्ययक्ष फुलचंद तिर्की समेत पूरी टीम पहुंची श्री जीतराम बेदीया के गाँव और माल्यार्पण कर आशीर्वाद लिया |
कौन थे जीतराम बेदिया ?=भारत के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष के अमर सेनानी शहीद जीतराम बेदिया|
औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन के खिलाफ अनेक क्रांतिकारी देशभक्तों ने अपनी जान की कुर्बानी दी है. लेकिन उनमें से कई जिन्होंने अपने नेतृत्व में अत्याचारी अंग्रेजों, उनके मुखबिरों, जमींदारों, साहूकारों और सूदखोर-महाजनों के अंतहीन शोषण के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किया था, बहुत दिनों तक गुमनाम रहे और कुछ तो आज भी गुमनाम हैं. जीतराम बेदिया उनमें से ही एक हैं.
जन्म, जन्मस्थान व परिवार
जीतराम बेदिया का जन्म 30 दिसंबर 1802 को रांची जिला के ओरमांझी प्रखंड अंतर्गत गगारी गांव के अत्यंत गरीब आदिवासी समुदाय में हुआ था. इनके पिता का नाम जगतनाथ बेदिया, माता का नाम महेश्वरी देवी व पत्नी का नाम गायत्री देवी था. गगारी गांव पहाड़ की तराइयों में बसा हुआ है. वे युवा काल से ही सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे थे. उनके क्रियाकलाप से आदिवासी समाज सहित सभी समुदायों के लोग काफी प्रसन्न रहा करते थे.
चुट्टुपालु घाटी क्षेत्र रांची-पिठौरिया से लेकर रामगढ़-झारीबाग तक फैला हुआ है. गगारी पहाड़ और चुटूपालू घाटी क्षेत्र घने जंगलों से भी भरा-पूरा है, इसकी प्राकृतिक छटा अत्यंत ही रमणीय है. रंग-बिरंगे पशु-पक्षियों के कलरव से पूरा वातावरण गूंजता रहता है. जीतराम बेदिया इस लुभावने दृश्य को देखकर आनंद से झूम उठते थे. उनके पिता ने गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी व सूअर पाल रखे थे. रोजाना जब वे जंगल में जानवरों को चराने ले जाते, जीतराम बेदिया भी उनके साथ लग जाते.
युवावस्था: व्यक्तित्व का विकास
पिता का शरीर अब धीरे-धीरे थकने लगा था. जीतराम बेदिया जैसे-जैसे बड़े हो रहे थे, उनकी जिम्मेवारी भी बढ़ रही थी. पिता के निधन के बाद घर की सारी जिम्मेवारी जीतराम के कंधों पर ही आ गयी. वे अपने पालतू पशुओं को जंगल में चराने जाया करते. शुरू में चरवाही करने में जीतराम बेदिया को काफी दिक्कत हुई. सभी जानवर अलग-अलग होकर जंगल में चरते थे. सभी को एक साथ जुटाने में काफी परेशानी होती थी. जीतराम बेदिया ने एक तरकीब सोची और पशुओं के गले में लकड़ी की ठरकी व घंटी बांध दी ताकि उनकी आवाज सुनकर उनको खोजने में सहूलियत हो. साथ ही, उन्होंने जंगल में मिलने वाले बांस को काटकर बांसुरी बनायी. गोधूलि बेला में जब घर वापसी होती वे पहाड़ से गांव तक बांसूरी बजाते हुए आते थे. गगारी पहाड़ में गायों, बैलों व बकरियों को चराने के दौरान ही समाजसेवा, देश सेवा और दीन-दुखियों की सेवा करने की भावना मजबूत हुई. न्याय-अन्याय को लेकर कई तरह के विचार उनके मन में पनप रहे थे. वे बचपन से ही साहसी एवं कुशाग्र बुद्धि के थे. तीरंदाजी सीखने के लिए उन्होंने खुद ही तीर-धनुष बनाया, गुलेल से भी अचूक निशाना साधना सीख लिया और केन्द और बढ़र के पेड़ के नीचे से पके फलों को बेधने का प्रयास करते रहते थे. जंगल में ही वे तीरंदाजी और गुलेल चलाने में काफी निपुण हो गए थे. तीर-धनुष, गुलेल व बांसूरी हमेशा अपने पास रखा करते थे. बचपन के इस कौशल ने कालान्तर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह की आग में घी का काम किया.
वे जंगल में मिलने वाली प्राकृतिक जड़ी बूटियों से छोटी-बड़ी बीमारियों का इलाज भी किया करते थे. बच्चे, वृद्ध, युवक व युवतियां इनकी दवा से अक्सर ठीक हो जाते. इनकी प्राकृतिक जड़ी-बूटियों के सेवन से काफी फायदा होता था. इस वजह से धीरे-धीरे जीतराम बेतिया की प्रसिद्धि में बढ़ोतरी होने लगी. दूर-दूर से लोग उनके पास आने लगेइस तरह से सबके साथ एक भाईचारा व एकता की भावना पैदा हुई. लोगों द्वारा बताए गए बहुत सारे कष्टों को सुनकर जीतराम बेतिया का मन उद्वेलित हो उठता था.
जीतराम बेदिया प्रकृति के पुजारी थे. वह सिंगबोंगा देवता (सूर्य), वनजारी देवता (मारांगबुरु), गांवा-देवती, जसपुरिया, गगारी गोसाई, सरना की पूजा करते थे. उन्हें बांसूरी के अलावा ढोल, मांदर व नगाड़ा बजाने में भी महारत हासिल थी. करमा-जितिया, सोहराय और सरहुल के दिन उनके मांदर की थाप सुनकर महिला, पुरुष, बच्चे व बच्चियां – सभी लोग अखरा पहुंचते और सामूहिक झूमर नाच में शामिल होकर भरपूर आनंद उठाते थे. प्राकृतिक धर्म व कला-संस्कृति के प्रति उनका रुझान देखते ही बनता था.
दिनों दिन उनमें लोगों का नेतृत्व करने की क्षमता भी बढ़ने लगी. लागों की सेवा करने और उनको एकजुट करने की अद्भुत क्षमता को देखकर आस-पास के गांव-क्षेत्र के लोग चर्चा करने लगे कि जीतराम बेदिया सत्यवादी और आंदोलनकारी हैं.
जीतराम बेदिया के व्यक्तित्व और चरित्र निर्माण में पारिवारिक माहौल का बहुत ही गहरा असर था. पिता स्वयं भी देशभक्त थे और हमेशा देश की सेवा करने के बारे में सोचते रहते थे. वे महसूस करते थे कि देश अंग्रेजों की गिरफ्त में है और उनके अन्याय-अत्याचार से छोटानागपुर क्षेत्र के लोग काफी प्रताड़ित हो रहे हैं. अंग्रेजी हुकूमत देश भर में राज कर रही है और अपने लोगों को उसके शोषण से बचाने के लिए अंग्रेजों को देश से खदेड़ना जरूरी है. ये बातें वे जीतराम बेदिया को भी बताते थे. पिता की कही सारी गंभीर बातें जीतराम बेदिया के जेहन में धीरे-धीरे घर कर रही थीं. बचपन में ही उन्होंने अपने पिता व पुरखों से अंग्रेजों के विरुद्ध हुए पलामू के चेरो विद्रोह, सिंहभूम के हो विद्रोह व तमाड़ विद्रोह की कहानियां सुन रखी थी. जब वे आदिवासियों पर अंग्रेजों के जुल्म की बातें सुनते तो उनका चेहरा तमतमाने लगता और मुठ्ठियां तन जातीं. मन में यह विचार आता कि अंग्रेजों को तीर से बींधकर अपने क्षेत्र से मार भगाया जाए
उस समय तक अंग्रेजी हुकूमत की गिद्ध नजर रांची, रामगढ़ व हजारीबाग के पहाड़ी छुट्टुपालु घाटी क्षेत्र के जल, जंगल, जमीन और पहाड़-पर्वत पर पड़ चुकी थी. वे इस क्षेत्र में निवास करने वाले समुदायों के भोलेपन का लाभ उठाने और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर अपने शासन के लिए धन जुटाने की योजना बना रहे थे. तत्कालीन ब्रिटिश शासन ग्रामीणों पर विभिन्न प्रकार से दबाव डालकर राजस्व (कर) संग्रह करने पर जोर देने लगा. स्वतंत्र और स्वाधीन रहने वाले आदिवासियों एवं अन्य समुदायों के खिलाफ जमींदारों व सूदखोर-महाजनों ने जो परिस्थिति पैदा कर दी थी वह अंग्रेजी राज को स्थापित करने में काफी मददगार साबित हुई. लेकिन इन्हीं परिस्थितयों में विद्रोह की भावना भी पैदा हुई. रामगढ़, पिठौरिया, ओरमांझी और समस्त छोटानागपुर क्षेत्र में अंग्रेजी शासन का प्रभाव बढ़ने लगा था. अंग्रेजों और जमींदारों के शोषण से क्षेत्र तबाह हो रहा था. यह देखकर जीतराम के अंदर विद्रोह करने व विद्रोह का नेतृत्व करने की इच्छा प्रबल हो उठी. युवा जीतराम बेदिया की सांगठनिक नेतृत्व क्षमता देखकर लोगों का विश्वास था कि वे ही अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह में उनकी अगुवाई कर सकते हैं. लेकिन जीतराम जानते थे कि यह लड़ाई अकेले नहीं जीती जा सकती है.
उसी समय ब्रिटिश शासन के विरुद्ध खटंगा गांव के राजा टिकैत उमराव सिंह और उनके दीवान खुदिया गांव के शेख भिखारी ने विद्रोह कर दिया. उनके द्वारा किए जा रहे संघर्ष की प्रेरणा से गगारी गांव के वीर योद्धा जीतराम बेदिया भी उनसे जुड़ गए. विद्रोह के दौरान तीनों में गहरी एकता बन गई और उन्होंने अपने-अपने इलाके में इसका नेतृत्व संभाल लिया. यह किसी घटना विशेष के विरुद्ध किया जाने वाला तात्कालिक व छिटपुट संघर्ष मात्रा नहीं था, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत की अन्यायकारी व्यवस्था के खिलाफ सशक्त विद्रोह था. इस इलाके की सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी भीषण बदलाव के दौर से गुजर रही थी. इस स्थिति का फायदा शोषक जमींदारों व सूदखोरों ने खूब उठाया. जिस जल, जंगल, जमीन को पुरखों ने अपने खून-पसीने से आबाद व संरक्षित रखा था, चुटूपालू घाटी क्षेत्र की जनता उससे महरुम होने लगी थी. शोषण करने के विभिन्न हथकंडो को अपनाकर तब तक फायदा उठाते रहे जब तक कि चुटूपालू घाटी क्षेत्र की जनता ने उनके विरुद्ध हथियार नहीं उठा लिये. वे योद्धा तीर-धनुष और तलवार संचालन में पारंगत थे. पूरे क्षेत्र में जनता के बीच इन तीन वीर विद्रोहियों के नाम की चर्चा आग की तरह फैल गई.
टिकैत उमराव सिंह, शेख भिखारी और जीतराम बेदिया ने आसपास के आदिवासियों व मूलवासियों को एकजुट करना शुरू किया. उन्होंने लोगों को बताया कि जल, जंगल, जमीन और सभी प्राकृतिक संसाधन हमारे हैं. जमींदारों से मिलकर अंग्रेज इनको हथियाना चाहते हैं. लोगों को इनकी बातों का मर्म समझ में आ गया. अंग्रेजी राज एवं उनके समर्थकों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल पफूंक दिया गया. सबको यह भी बताया गया कि अंग्रेजों के पास गोला-बारूद, बन्दूकें और तोपें हैं. तीर-धनुष और तलवार से उनका मुकाबला करने के साथ हमें छिपकर आक्रमण करने की नीति अपनानी होगी. अंग्रेजों के पास इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति का ज्ञान अधूरा है. ऐसी स्थिति में जंगल की झाड़ियों में छुपकर उन पर अचानक हमला बोल दिया जाए तो वे मैदान छोड़कर भाग खड़े होंगे. सभी लोगों को ये विचार बहुत पसंद आये और सबने एक स्वर में उन लोगों का समर्थन किया.
सन 1855-56 में संथाल विद्रोह चल ही रहा था कि 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ देश में सिपाही विद्रोह हुआ. उस समय ओरमांझी, रांची व रामगढ़ क्षेत्र में विद्रोह की कमान टिकैत उमराव सिंह, शेख भिखारी और जीतराम बेदिया के हाथों में थी. वे विद्रोह की रणनीति बनाने के लिए जगह-जगह गुपचुप तरीके से बैठकें करने लगे. लोगों को जैसे ही यह समाचार मिला कि तीनों योद्धाओं ने विद्रोह की कमान संभाल रखी है, वे दोगुने उत्साह से विद्रोहियों की टोली में शामिल होने लगे. इस तरह विद्रोहियों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी. जीतराम बेदिया ने अपने लड़ाकू साथियों को तीर-धनुष, तलवार, ढेलबांस, ढ़ेला, गुलेल, कुल्हाड़ी, कुल्हाड़ू, बलम, बरछी, दरौंती, हंसुआ और पत्थर जमा कर रखने को कहा. आत्मविश्वास के साथ अंग्रेजों की बंदूकों का सामना इन्हीं पारंपरिक हथियारों के माध्यम से करने की ठानी और सभी साथियों से जीतने के लिए हौंसला बुलंद रखने को कहा.






