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जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संवाद–2026 में झारखंड की नौ भाषाओं ने रखा अपना पक्ष, 11 सूत्री मांग-पत्र श्री बंधु तिर्की को सौंपा |

रांची : डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, राँची में “जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संवाद–2026” का सफल एवं गरिमामय आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक संवाद में झारखंड की नौ जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं—कुडुख, मुंडारी, हो, संथाली, नागपुरी, खड़िया, खोरठा, पंचपरगनिया एवं कुरमाली—के शिक्षक-विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं भाषा प्रेमियों सहित लगभग 200 प्रतिभागियों ने भाग लिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि माननीय श्री बंधु तिर्की तथा विभिन्न भाषाओं के प्रतिष्ठित विद्वानों की उपस्थिति में दीप प्रज्वलन एवं जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के दिवंगत विद्वानों को श्रद्धांजलि अर्पित कर किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. शैलजा बाला ने किया।

मंच पर माननीय श्री बंधु तिर्की, डॉ. शकुंतला मिश्र (नागपुरी), श्रीमती मेरी क्लोडिया सोरेंग (खड़िया), डॉ. मनसिद बड़ायउद (मुंडारी), डॉ. बी.एन. ओहदार (खोरठा), डॉ. हरि उरांव (कुडुख), डॉ. दीनबंधु महतो (पंचपरगनिया एवं संथाली के प्रतिनिधि), डॉ. सरस्वती गगराई (हो) तथा डॉ. वृन्दावन महतो (कुरमाली) मंचासीन थे। कार्यक्रम में डॉ. प्रकाश चंद्र उरांव, पूर्व निदेशक, डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान (TRI), डॉ. खालिक अहमद तथा राजा राम महतो की भी विशेष उपस्थिति रही।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुंडारी विभाग के शोधार्थियों द्वारा प्रस्तुत स्वागत गीत से हुआ। इसके उपरांत डॉ. हेमंत कुमार टोप्पो ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। अपने उद्घाटन संबोधन में श्री बंधु तिर्की ने मातृभाषाओं के संरक्षण, संवर्धन, शिक्षा एवं शोध की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि झारखंड की भाषाएँ राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता और पहचान की आधारशिला हैं।

प्रथम तकनीकी सत्र में नौों भाषाओं के शिक्षक-विद्वानों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने भाषावार अलग-अलग समूहों में सामूहिक परिचर्चा की। प्रत्येक समूह ने अपनी भाषा की वर्तमान स्थिति, चुनौतियों, शिक्षा, शोध, संरक्षण एवं विकास से जुड़े विषयों पर गंभीर विचार-विमर्श किया तथा अपने-अपने प्रस्ताव तैयार किए। सभी प्रस्तावों को समेकित कर 11 सूत्री साझा मांग-पत्र तैयार किया गया, जिसे मुख्य अतिथि श्री बंधु तिर्की को सौंपा गया, ताकि इन्हें राज्य सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से रखा जा सके।

संवाद में प्रतिभागियों ने कहा कि झारखंड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाएँ केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक विरासत, इतिहास, लोकज्ञान और सामाजिक पहचान की आधारशिला हैं। इनके संरक्षण एवं विकास के लिए ठोस नीतिगत पहल, पर्याप्त बजट तथा संस्थागत व्यवस्था समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में “जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा” के गठन की घोषणा की गई तथा 10 सितम्बर 2026 को राज्यव्यापी “जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा यात्रा” आयोजित करने का निर्णय लिया गया।

इस अवसर पर बिनाधर सांडिल, जगदीश उरांव, डॉ. बसंत कुमार, विक्की मिंज
, चन्दन कुमार सहित विभिन्न भाषाओं के शिक्षक, विद्वान, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सफल आयोजन सभी नौ भाषाओं के शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के सामूहिक सहयोग से संपन्न हुआ।

 

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